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लखनऊ प्रेस क्लब में साहित्य का संगम - पेशवा वंशज ने किया 'संक्रान्ति का संहार' और 'काल यात्रा' का लोकार्पण

  लखनऊ, । हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।         उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और म...

लखनऊ के सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल को टी4 एजुकेशन के ‘वर्ल्ड्स बेस्ट स्कूल’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया


 लखनऊ, 25 जून 2026:लखनऊ के गोमती नगर स्थित, स्कूल ऑफ़ कॉन्शियस ट्रांसफॉर्मेशन, सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल को टी4 एजुकेशन ने वर्ल्ड्स बेस्ट स्कूल पुरस्कार (डब्ल्यूबीएस) से सम्मानित किया है। टी4 एजुकेशन विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त संस्था है जो लोगों के जीवन और समुदायों में बदलाव लाने वाले स्कूलों को सम्मानित करती है।

 यह सम्मान भावनात्मक जागरूकता, आत्म-चिंतन, मानसिक कल्याण, भीतरी विकास एवं सजग विकास की दिशा में स्कूल द्वारा किए जा रहे असाधारण एवं सतत प्रयासों के लिए दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया, एशिया, यूरोप, अमेरिका और अन्य क्षेत्रों के अग्रणी स्कूलों की प्रविष्टियों के बीच, इस स्कूल को कम्युनिटी कोलैबोरेशन कैटेगरी में दुनिया के टॉप 10 स्कूलों में शामिल किया गया है। 

आज इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड की घोषणा की गई, जिससे सर्वांगीण और मनुष्य-उन्मुख शिक्षा के लिए स्कूल की वैश्विक पहचान और मज़बूत हुई है। जो सर्वांगीण शिक्षा के जयपुरिया मॉडल को दुनिया के मंच पर मजबूती से स्थापित करती है।

“सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल के लिए सफलता के मायने कुछ अलग हैं। 1992 में स्थापित इस स्कूल ने पिछले तीन दशकों में आत्म-जागरूकता और अकादमिक उत्कृष्टता में बेहतरीन प्रदर्शन पर आधारित शैक्षणिक मॉडल तैयार किया है। स्कूल लगातार राष्ट्रीय मानकों से बेहतर प्रदर्शन करता रहा है- 2025 में स्कूल ने आईसीएसई ग्रेड 10 में औसत 89.22 फीसदी, 2026 में और 87.9 फीसदी परिणाम दर्ज किए। इसी तरह 2026 में आईएससी का औसत परिणाम 87.06 फीसदी रहा। साथ ही, ज़्यादातर विषयों के परिणाम राष्ट्रीय औसत से तीन गुना तक बेहतर रहे हैं। स्कूल का मुख्य मकसद पाँच पहलुओंः शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक के आधार पर हर छात्र के भीतरी एवं गहन विकास को सुनिश्चित करना है।’ सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल, लखनऊ की प्रिंसिपल प्रोमिनी चोपड़ा ने कहा।

‘इंसान बनाने वाली शिक्षा और युवाओं में राष्ट्रीय चरित्र विकसित करने के विज़न के साथ शुरू किए गए इस स्कूल में छात्रों की उम्र को ध्यान में रखते हुए प्रोजेक्ट पेश किए जाते हैं, जिनके माध्यम से छात्रों को अपने आप में सजग बदलाव लाने और अपने आप को बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

स्कूल के अनुसार यह ‘संस्कार देने वाली शिक्षा’ जो छात्रों को भारतीय मूल्यों के साथ-साथ जीवन भर काम आने वाली क्षमताएं भी प्रदान करती है। 2011 के बाद से 2,00,000 से अधिक छात्र स्व-अभिव्यक्ति एवं व्यक्तिगत बदलाव से जुड़ी इस यात्रा में शामिल हो चुके हैं।

एसएमआरजे संवाद, बातचीत के ऐसे सत्र हैं जो छात्रों, अभिभावकों और दादा-दादी/नाना-नानी को एक साथ लाते हैं। ये सत्र परिवार में बातचीत को बेहतर बनाते हैं और क्लासरूम के बाहर भी भावनात्मक मज़बूती और मानसिक स्वास्थय को बढ़ावा देते हैं। यह पहल ज़्यादा स्क्रीन टाइम (जैसे रील्स, गेमिंग और सोशल मीडिया का इस्तेमाल) से जुड़ी समस्याओं को दूर करके बेहतर डिजिटल आदतों को बढ़ावा देती है।

“स्कूल की विशेष प्रथा साइलेंस टाइम (मौन का समय), रोज़ाना चार बार होती है। इस समय पूरे कैंपस में मदर्स ऑर्गन का संगीत बजता है तथा नर्सरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी तक के सभी छात्र, अध्यापक, प्रशासनिक एवं सर्विस स्टाफ़ एक साथ शांत अवस्था में आ जाते हैं। रोज़ाना आभार व्यक्त करने की इस प्रथा से छात्रों में भावनात्मक संतुलन, एकाग्रता और मुश्किलों का सामना करने की क्षमता विकसित होती है। यह प्रथा भगवद गीता की इस सीख पर आधारित है कि किसी ऊंचे उद्देश्य के लिए किया गया हर काम बदलाव का ज़रिया बन जाता है,” स्कूल की संस्थापक एवं वाइस चेयरपर्सन अंजलि जयपुरिया ने कहा।

स्कूल की सामुदायिक पहुँच नवसृजन के ज़रिए होती है। यह एनआईओएस बोर्ड से जुड़ा अंग्रेज़ी माध्यम से निःशुल्क स्कूल है (किंडरगार्टन से 10वीं कक्षा तक), जिसे उत्तरप्रदेश में ईडब्ल्यूएस एडमिशन अनिवार्य होने से बहुत पहले 2010 में शुरू किया गया था। नवसृजन के छात्रों को भी वही लाइब्रेरी, लैब, स्पोर्ट्स और आर्ट्स सुविधाएँ इस्तेमाल करने का मौका मिलता है, जो दूसरे छात्र करते हैं। मेधावी छात्रों को मुख्य स्कूल में 11वीं कक्षा में एडमिशन मिल जाता है और यहाँ से पढ़कर निकले छात्र आईआईटी, लेडी श्रीराम कॉलेज और हिंदू कॉलेज जैसे संस्थानों में जाते हैं।

नवसृजन एलुमनाई कम्युनिटी बदलाव के लिए एक मज़बूत ताकत बनकर उभरा है। शिक्षा के ज़रिए अपनी ज़िंदगी बदलने के बाद, कई लोग अब ज़रूरतमंद छात्रों की मदद कर रहे हैं और शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक मज़बूती के ज़रिए परिवारों की मदद कर रहे हैं। कई एलुमनाई लखनऊ के स्कूलों में एजुकेटर और मेंटर भी हैं, जो सांस्कृतिक मूल्यों एवं भाषा को बनाए रखते हुए लर्निंग को बढ़ावा देते हैं, और समुदाय पर दीर्घकालिक बदलाव उत्पन्न करते हैं।

काउंसिल फॉर इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन ने अपने तौर-तरीकों को पायलट के रूप में आज़माने और देशभर में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए इस स्कूल को चुना है, जिससे यह स्कूल पूरे भारत में बड़े पैमाने पर शैक्षिक बदलाव लाने में एक अहम भूमिका निभाएगा।

स्कूल के हीलिंग हैबिटैट को हफ़पोस्ट और यूसी बर्कले के ग्रेटर गुड साइंस सेंटर द्वारा फीचर किया गया है, इस तरह यह दोनों सम्मान हासिल करने वाला भारत का पहला स्कूल बन गया है। टीचर्स विदाउट बॉर्डर्सश् के संस्थापक फ्रेड मेडनिक ने टीडब्ल्यूबी प्लेटफ़ॉर्म पर स्कूल के प्रोजेक्ट्स को डॉक्यूमेंट किया है। छात्रों को ऐसे टेक्नोलॉजी-आधारित समाधान विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है जो असल दुनिया की सामाजिक चुनौतियों का समाधान करते हैं, जैसे नेत्रहीनों को खरीदादी में मदद करने वाला डिवाइस। 

स्कूल की सभी 66 शाखाओं में नर्सरी से आठवीं कक्षा तकके लिए संस्कृत को अनिवार्य भाषा के रूप में सिखाया जाता है, जिसके लिए इनका अपना पाठ्यक्रम देवभाषा है। वेदों, उपनिषदों और भगवद्गीता पर आधारित यह पाठ्यक्रम स्कूल की संस्कार-आधारित शिक्षा को उजागर करता है जो सांस्कृतिक ज्ञान को आज के जीवन से जोड़ती है।

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