होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र (HBCH & MPMMCC), वाराणसी में कैनकिड्स किड्सकैन तथा एक्सिस बैंक के सहयोग से पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी नर्सेज़ वर्कशॉप का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य बाल कैंसर रोगियों की देखभाल में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों के ज्ञान, कौशल एवं व्यावहारिक दक्षता को सुदृढ़ बनाना था। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. अमिता महेश्वरी, निदेशक, HBCH एवं MPMMCC के संरक्षण में किया गया। कार्यक्रम में डॉ. बी.के. मिश्रा, उप निदेशक, डॉ. शशिकांत पाटने, डीन अकादमिक्स, डॉ. राघवेश रंजन, प्रभारी, पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग, तथा डॉ. सौमित्र साहा, प्रोफेसर, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की महत्वपूर्ण सहभागिता रही। कार्यशाला का शुभारम्भ पंजीकरण एवं प्री-टेस्ट के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ. योगिता भाटिया ने कैनकिड्स किड्सकैन की गतिविधियों एवं बाल कैंसर देखभाल में प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों द्वारा बाल कैंसर की पहचान एवं उपचार, न्यूट्रोपेनिक फीवर का प्रबंधन, पोषण संबंधी देखभाल, रक्त एवं...
लखनऊ। कैंसर के मरीजों पर सभी दवाएं असर नहीं करती हैं। उल्टा कुछ दवाएं नुकसान भी पहुंचा सकती हैं। केजीएमयू में अब बिना चीर-फाड़ किए ही यह पता लगाया जा सकेगा कि किस मरीज पर कौन सी दवा असर करने वाली है। डायनेमिक कंट्रास्ट इनहैंस्ड मैग्नेटिक रेजोनेंस (डीसीई-एमआरआई) की मदद से यह हो सकेगा। केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग में तीन साल तक हुए शोध में यह निष्कर्ष निकला है। इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित क्लीनिकल कैंसर रिसर्च जर्नल में मान्यता दी गई है।
केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग के शिक्षक डॉ. दुर्गेश द्विवेदी ने वर्ष 2016 से 2019 के बीच यह शोध किया है। अब इसे जर्नल ने मान्यता देते हुए छापने का फैसला किया है। डॉ. दुर्गेश ने बताया कि किडनी के कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 13 दवाओं को मान्यता दी है। इन दवाओं को तीन समूह में बांटा गया है। इसके बावजूद अभी भी यह बता पाना मुश्किल है कि किस मरीज पर कौन सी दसा असर करेगी। कई बार मरीज को दी जा रही दवा फायदा करने के बजाय नुकसान कर देती है। यह स्थिति कैंसर के मरीज के लिए और भी घातक होती है। किडनी मेें मौजूद ट्यूमर की जांच ऑपरेशन कर उसे बाहर निकालने के बाद ही संभव हो पाती थी। ऐसे में दवाओं से उनका इलाज करना काफी चुनौती भरा काम होता है। इसको देखते हुए विभाग में डीसीई-एमआरआई का उपयोग कर रेडियोजिनोमिक्स विधा विकसित की। यह इमेजिंग, रेडियोमिक्स तथा जिनोमिक्स का मिश्रण है।
चिकित्सा प्रणाली का हो सकेगा चयन
डॉ. दुर्गेश ने बताया कि इस शोध के लिए 49 मरीजों के 80 नमूने लिए गए। ये मरीज एंजीयोजेनिक तथा इम्यूनोथेरेपी ले रहे थे। डीसीई-एमआरआई विश्लेषण से पता चला कि एक ही ट्यूमर में एंजियोजेनेसिस और एंफ्लामेटरी विभिन्न तरीकों से बढ़ रहे थे। कैंसर में कोशिकाएं अपनी खुद की ब्लड सप्लाई विकसित कर लेती हैं। इस शोध के बाद ऐसी कोशिकाओं की पहचान की जा सकेगी तथा बेहतर दवा दी जा सकेगी। इस प्रणाली का उपयोग अब केजीएमयू में भी हो सकेगा। विवि के कुलपति ले. जनरल डॉ. बिपिन पुरी ने रेडियोडायग्नोसिस विभाग को बधाई देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. नीरा कोहली तथा अन्य संकाय सदस्यों को सुझाव दिया कि इस अध्ययन को रोगियों के हित में लाभकारी बनाया जाए। इसके बाद अब इसे लागू करने की तैयारी हो रही है।
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