स्मार्ट फोन, लैपटॉप जैसे डिजिटल डिवाइस के किशोरों और बच्चों पर प्रभाव को लेकर विरोधाभासी अध्ययन सामने आते रहे हैं। कुछ स्टडी में बताया गया कि स्क्रीन पर अधिक समय बिताना नुकसानदेह है। एक अन्य स्टडी का कहना है कि इसका मामूली संबंध है। विशेषज्ञों का कहना है, खतरे भी हैं और कुछ फायदे भी हैं।
अमेरिका में प्यू एजेंसी के एक सर्वे में पाया गया कि 95% टीनएजरों की पहुंच स्मार्ट फोन तक है। उनमें से 45% ने बताया कि वे ऑनलाइन रहते हैं। इस बीच शोधकर्ताओं ने किशोरों, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसके असर का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया। 2017 में क्लीनिकल साइकोलॉजी साइंस पत्रिका में प्रकाशित स्टडी में बताया गया कि किशोरों के लंबे समय तक स्क्रीन देखने का खराब असर पड़ सकता है। वे अवसाद का शिकार हो सकते हैं। आत्महत्या का प्रयास कर सकते हैं।
इस वर्ष ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एमी ओरबेन और एंड्रयू प्रिजिबिलस्की ने रिसर्च में पाया कि किशोरों की सेहत और डिजिटल टेक्नोलॉजी का महीन संबंध है। उन्होंने, 2017 और अन्य स्टडी के डेटा का और अधिक गहराई से अध्ययन किया है। यह स्टडी नेचर ह्यूमन बिहेवियर पत्रिका में छपी है। उनका कहना है कि डिजिटल टेक्नोलॉजी के उपयोग का किशोरों पर बहुत कम नकारात्मक असर पड़ता है। उन्होंने, नशा करने या सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग से हुए प्रभाव का भी अध्ययन किया है।
हालांकि, अधिक नकारात्मक संबंध न होने का अर्थ यह नहीं कि स्क्रीन पर समय गुजारना किशोरों के लिए ठीक है। इसके साथ भारी जोखिम और कुछ अच्छाइयां जुड़ी हैं। ओरेगॉन यूनिवर्सिटी में डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य सेंटर के डायरेक्टर निक एलन कहते हैं, डिजिटल टेक्नोलॉजी से फायदे भी जुड़े हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में मानव विकास इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर रोनाल्ड डहल का कहना है, डिजिटल गतिविधियों के फायदे, नुकसान का संबंध उस पर बिताए जाने वाले समय पर निर्भर करता है। इस पर भी कि उस पर क्या देखा जा रहा है।
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