होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र (HBCH & MPMMCC), वाराणसी में कैनकिड्स किड्सकैन तथा एक्सिस बैंक के सहयोग से पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी नर्सेज़ वर्कशॉप का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य बाल कैंसर रोगियों की देखभाल में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों के ज्ञान, कौशल एवं व्यावहारिक दक्षता को सुदृढ़ बनाना था। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. अमिता महेश्वरी, निदेशक, HBCH एवं MPMMCC के संरक्षण में किया गया। कार्यक्रम में डॉ. बी.के. मिश्रा, उप निदेशक, डॉ. शशिकांत पाटने, डीन अकादमिक्स, डॉ. राघवेश रंजन, प्रभारी, पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग, तथा डॉ. सौमित्र साहा, प्रोफेसर, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की महत्वपूर्ण सहभागिता रही। कार्यशाला का शुभारम्भ पंजीकरण एवं प्री-टेस्ट के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ. योगिता भाटिया ने कैनकिड्स किड्सकैन की गतिविधियों एवं बाल कैंसर देखभाल में प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों द्वारा बाल कैंसर की पहचान एवं उपचार, न्यूट्रोपेनिक फीवर का प्रबंधन, पोषण संबंधी देखभाल, रक्त एवं...
गुलजार के गीत और उनकी नज्मों में आम आदमी का दर्द सरल शब्दों में बयां किया गया है। ऐसा लगता है जैसे गुलजार अपने काव्य के जरिए आप की ही बात कर रहे हैं। सोंधी और सुहाना एहसास उनके गीतों की प्रमुख विशेषता है। चार दशकों से उनके शब्दों की धार कम नहीं हो रही है। वह आज भी युवाओं को अपने गीतों के जरिए बांध कर रख देते हैं। आगे पढ़िए गुलजार की कुछ चुनिंदा नज्में.....
जड़ें मिट्टी में लगती हैं.....
सुना है मिट्टी-पानी का अज़ल से एक रिश्ता है,
जड़ें मिट्टी में लगती हैं...
जड़ों में पानी रहता है।
तुम्हारी आँख से आँसू का गिरना था कि
दिल में दर्द भर आया,
ज़रा से बीज से कोंपल निकल आयी!!
जड़ें मिट्टी में लगती हैं.....
जड़ें मिट्टी में लगती हैं,
जड़ों में पानी रहता है!!
सुना है मिट्टी-पानी का अज़ल से एक रिश्ता है,
जड़ें मिट्टी में लगती हैं...
जड़ों में पानी रहता है।
तुम्हारी आँख से आँसू का गिरना था कि
दिल में दर्द भर आया,
ज़रा से बीज से कोंपल निकल आयी!!
जड़ें मिट्टी में लगती हैं.....
जड़ें मिट्टी में लगती हैं,
जड़ों में पानी रहता है!!
चार तिनके उठा के....
चार तिनके उठा के....
चार तिनके उठा के जंगल से
एक बाली अनाज की ले कर
चन्द कतरे-से बासी अश्कों के
चन्द फ़ाके़ बुझे हुए लब पर
मुट्ठी भर अपनी क़ब्र की मिट्टी
मुट्ठी भर आरजुओं का गारा
एक तामीर की लिये हसरत
तेरा ख़ानाबदोश बेचारा
शहर से दर-ब-दर भटकता है
तेरा कन्धा मिले तो सर टेकूँ।
चार तिनके उठा के जंगल से
एक बाली अनाज की ले कर
चन्द कतरे-से बासी अश्कों के
चन्द फ़ाके़ बुझे हुए लब पर
मुट्ठी भर अपनी क़ब्र की मिट्टी
मुट्ठी भर आरजुओं का गारा
एक तामीर की लिये हसरत
तेरा ख़ानाबदोश बेचारा
शहर से दर-ब-दर भटकता है
तेरा कन्धा मिले तो सर टेकूँ।
आग का पेट बड़ा है!
आग का पेट बड़ा है!
आग का पेट बड़ा है!
आग को चाहिए हर लह़जा चबाने के लिए
ख़ुश्क करारे पत्ते
आग कर लेती है तिनकों पे गुज़ारा लेकिन....
आशियानों को निगलती है निवालों की तरह,
आग को सब्ज़ हरी टहनियाँ अच्छी नहीं लगतीं,
ढूँढती है कि कहीं सूखे हुए जिस्म मिलें !
उसको जंगल की हवा रास बहुत है फिर भी
अब ग़रीबों की कई बस्तियों पर देखा है हमला करते,
आग अब मंदिर-मस्जिद की ग़िजा खाती है!
लोगों के हाथों में अब आग नहीं....
आग के हाथों में कुछ लोग हैं अब।
आग का पेट बड़ा है!
आग को चाहिए हर लह़जा चबाने के लिए
ख़ुश्क करारे पत्ते
आग कर लेती है तिनकों पे गुज़ारा लेकिन....
आशियानों को निगलती है निवालों की तरह,
आग को सब्ज़ हरी टहनियाँ अच्छी नहीं लगतीं,
ढूँढती है कि कहीं सूखे हुए जिस्म मिलें !
उसको जंगल की हवा रास बहुत है फिर भी
अब ग़रीबों की कई बस्तियों पर देखा है हमला करते,
आग अब मंदिर-मस्जिद की ग़िजा खाती है!
लोगों के हाथों में अब आग नहीं....
आग के हाथों में कुछ लोग हैं अब।
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